रावण-लंका का चक्रवर्ती सम्राट, चारों वेदों का ज्ञाता, संगीत और शास्त्रों में पारंगत विद्वान, और शिव का परम भक्त। पर इतिहास ने उसे सदा केवल एक खलनायक के रूप में देखा है। रजत बिन्दल की यह कृति 'रावण : मोक्ष की खोज' उस मिथक को तोड़ते हुए रावण को पहली बार उसकी ही आवाज़ में सामने लाती है-एक ऐसी आत्मा जो अमरता के श्राप से थक चुकी है, जो अपने दस सिरों में समाए असीम ज्ञान के बोझ तले दबी है, और जो शक्ति और शांति के बीच सदियों से भटक रही है।कथा की शुरुआत होती है लंका के महल की उस रात से, जब रावण अपनी अमरता से मुक्ति की कामना करता है। यहाँ से यात्रा शुरू होती है-ब्रह्मा के वरदान से, कैकसी और विभीषण जैसे परिवार के साथ जटिल संबंधों से, सीता के स्वयंवर की पहली झलक से, दण्डक वन में प्रतीक्षा और स्वर्ण मृग के छल से, होते हुए अंतिम युद्ध तक, जहाँ पिता के रूप में उसका सबसे बड़ा पाप-मेघनाद का बलिदान-उसे उसकी सच्चाई से रूबरू कराता है।पूरी कथा एक पोथी के माध्यम से कही जाती है, जिसे युद्ध के बाद मंदोदरी पढ़ती हैं-रावण के अंतिम पत्र तक, जिसमें वे स्वीकार करते हैं कि मुक्ति की चाह में उन्होंने सबसे कठिन और सबसे दर्दनाक मार्ग चुना। मंदोदरी का दुख, उनका क्रोध, और अंततः उनकी समझ-यह सब पाठक को उतनी ही गहराई से छूता है जितना रावण की अपनी पीड़ा।'मोक्ष की खोज' रावण को न नायक बनाती है, न पूर्ण खलनायक-बल्कि एक जटिल मानव आत्मा के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसमें अहंकार भी है और भक्ति भी, विद्वता भी है और पीड़ा भी। यह उपन्यास हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या हम सब अपनी-अपनी लंका रचते और नष्ट करते हुए, अपने ही मोक्ष की खोज में नहीं हैं। एक प्राचीन कथा, एक नए दृष्टिकोण से।
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