कुछ घटनाएँ जीवन में बहुत छोटी होती हैं-इतनी छोटी कि उन्हें सामान्य समझकर भुला दिया जाए।लेकिन कभी-कभी वही छोटी घटनाएँ मनुष्य के भीतर एक लंबी यात्रा शुरू कर देती हैं। कमरा नंबर 24 ऐसी ही एक संवेदनशील साहित्यिक यात्रा है, जहाँ एक साधारण-सी व्यवस्था, एक बदला हुआ कमरा, और कुछ अनकहे संवाद धीरे-धीरे रिश्तों, अपेक्षाओं, आत्मसम्मान और समझ के गहरे प्रश्नों में बदल जाते हैं। कश्मीर की शांत घाटियों, विश्वविद्यालयी वातावरण, मित्रता की सहजता और मानवीय संवेदनाओं की जटिल परतों के बीच यह उपन्यास पाठक को उस दुनिया में ले जाता है, जहाँ चुप्पियाँ भी संवाद करती हैं और छोटी असहमतियाँ आत्मबोध का माध्यम बन जाती हैं। डॉ. गौरव शर्मा अपनी सहज, आत्मीय और भावनात्मक लेखन शैली में यह दिखाते हैं कि रिश्ते केवल साथ रहने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की अनुभूतियों को समझने से बनते हैं। यह उपन्यास स्मृतियों, संवादों, आत्मविश्लेषण और मानवीय संबंधों की उन सूक्ष्म परतों की कहानी है, जिन्हें हम अक्सर महसूस तो करते हैं, पर शब्द नहीं दे पाते।
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