डिजिटल युग में सूचना का संकट अब केवल तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक-मनोवैज्ञानिक चुनौती बन चुका है। यह पुस्तक 'व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय' के उदय का विश्लेषण करती है, जहाँ अब तथ्यों की तुलना में 'समूह पहचान' और 'भावनात्मक पूर्वाग्रह' अधिक प्रभावी हो गए हैं। जैसे-जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म अफवाहों को "सत्य" में बदल रहे हैं, माइक्रो-टारगेटिंग और एआई-जनित डीपफेक लोकतंत्र की बुनियाद को खतरे में डाल रहे हैं, जिससे नागरिक वैचारिक बुलबुलों (Filter Bubbles) में कैद होते जा रहे हैं। लेखक का तर्क है कि इसका समाधान केवल तकनीकी सुधारों में नहीं, बल्कि 'नागरिक प्रबोधन' में है। यह पुस्तक स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं से संगठित झूठ के जाल को तोड़ने और 'आलोचनात्मक सोच' व 'तथ्यों के सत्यापन' की संस्कृति को पुनर्जीवित करने का आह्वान करती है। इसमें क्या सुधार किया गया है?प्रभावशीलता: 'समूह पहचान' और 'नागरिक प्रबोधन' जैसे शब्दों का प्रयोग इसे एक गंभीर शोधपरक पुस्तक का रूप देता है।प्रवाह: वाक्यों को छोटा और आपस में जुड़ा हुआ रखा गया है ताकि पाठक को विषय की गंभीरता तुरंत समझ आए।शब्द चयन: 'Filter Bubbles' और 'Micro-targeting' जैसे तकनीकी शब्दों को उनके संदर्भ के साथ रखा गया है ताकि हिंदी पाठक भी उन्हें आसानी से समझ सकें।
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