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मेघ ओ.. मेघ: कालिदास रचित मेघदूतम् पर आधारित: कालिदास रचित ... आधारित - Softcover

अशोक बैरागी

 
9798896735601: मेघ ओ.. मेघ: कालिदास रचित मेघदूतम् पर आधारित: कालिदास रचित ... आधारित

Inhaltsangabe

जहां तक मेरी अपनी स्वयं की अवधारणा है कि – कवि मानव समाज में सृष्टि का सौंदर्य दर्शक यंत्र है। उसके द्वारा सहृदय रसिक जनों को सृष्टि का अंतस् एवं बाह्य सौंदर्य दिखाई पड़ता है। कवि अपने मानस जगत में सृष्टि का उपभोग करता है... और जब वह उन्मक्त हो जाता है... तब उसके ‘प्रलाप’ के रूप में उसकी उन्मत्ता फूट पड़ती है – यही अंतस् प्रलाप है... यही वो काव्य है जो, अंतस् रस में रचा बसा रस के नौ रंगों की व्युत्पत्ति कर – युग... समाज... राष्ट्र की विचार धारा को नवीन गति प्रदान करता है... इक नये आयाम की शुरुआत करता है। दो सहस्राब्दियों से भी अधिक समय से पूर्व (लगभग 70-75 वर्ष ईसा पूर्व) कालिदास, उनकी अप्रतिम कल्पनायों में से एक... साकार विरह वेदना... ‘मेघदूतम’ कहीं न कहीं मेरी उपर्युक्त अवधारण को बल देती प्रतीत होती है। काव्यानुवाद के रूप में ‘मेघ ओ मेघ’ आपके हाँथों में है – फिर भी मुझे विश्वास नहीं होता... इस प्रस्तुतीकरण के पीछे मैं... स्वयं हूँ। बहुत बामुश्किल है... अपने मन के भावों का प्रकटीकरण। सच है... यथार्थ की सच्चाई से दूर रहकर कवि, हृदय का निवासी कभी नहीं हो सकता – कभी तत्ववेत्ता भी तो नहीं है। क्योंकि, तत्ववेत्ता मस्तिष्क का निवासी होता है... जबकि कवि हृदय का। त्रिगुणात्मक सृष्टि का केंद्र स्थल हृदय ही तो है... उसमें सच... यथार्थ के अलावा कुछ नहीं होना चाहिए। उस यथार्थ का प्राकट्य ही कवि के सरल हृदय का परिचायक है। मुझे पूर्ण विश्वास है – अपने सरल... सुबोध स्वरूप में यह कृति कालिदास की उस अप्रतिम विरह कल्पना का यथार्थ-बोध आम पाठक को कराने में सक्षम होगी।

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