मानव की आँख खुली तो उसने देखा मधु उसके पास बैठी उसे उठा रही थी। उसके बदन की ख़ुशबू से लग रहा था कि वह नहा चुकी थी। उसके बाल भी गीले थे। मानव की आँख नींद से खुल ही नहीं रही थी। उसने खिड़की की ओर देखा अभी भी अँधेरा लग रहा था। उसने घड़ी की ओर नज़रें दौड़ाई। रात के तीन बज के बीस मिनट हुए थे। “क्या हुआ मधु?” “उठो मुँह-हाथ धोकर फ़्रेश हो जाओ। मैं जब तक चाय बनाने जा रही हूँ। फिर पार्क में घूमने चलेंगे।” “अभी तो रात है मधु। सुबह के तीन बीस हुए हैं,” उसने फिर से घड़ी देखी। “रात है? मैं तो उठ गयी और नहा भी चुकी। मुझे लगा सवेरा हो गया है।”
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