मनुष्य (मानव) – मनन या तर्क द्वारा किसी भी वस्तु का स्वरूप निश्चय करना इसका प्रधान मार्ग इसलिए इसे मनुष्य नाम दिया गया है । मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है । (मन एवं मनुष्यानाम कारणम बन्ध मोक्षयो) मनुष्य की खास विशेषताएं दो ही हैं – मस्तिष्क का विकास और खड़े होकर चलना ।मनुष्य - शरीर केवल कर्म करने का साधन है और कर्म केवल संसार के लिए ही होता है । मनुष्य योनि ही कर्म योनि है, पुराने कर्मों का फल भोग नया पुरुषार्थ । चौरासी लाख योनि विवरण - जलचर – 9 लाख, स्थावर अर्थात पेड़ - पौधे – 20 लाख, सरीसृय कृमि अर्थात कीड़े – मकोड़े – 11 लाख, पक्षी/नभचर – 10 लाख, स्थलीय/थलचर – 30 लाख और 4 लाख मानवीय नस्ल के । कुल 84 लाख । पद्म पुराण में 84 लाख योनिओं का ज़िक्र है | और यह कि 84 लाख योनियाँ 6 समूहों में बंटी हुई हैं — जलज (9 लाख), वनस्पति (20 लाख), कीट (11 लाख), पक्षी (10 लाख), पशु (30 लाख) और मानव (4 लाख) |प्रत्येक मानव अपने साढ़े तीन हाथ का होता है, एक हाथ में 24 अंगुल होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक मानव अपने 84 अंगुल लम्बाई के बराबर होता है ।
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